सावन की ये बुँदे निर्झर 

बरस रहा है मोती बनकर 

तू भौरे सी उड़ जाती है।

सहसा देख यूँ मुड़ जाती है

ओस तेरे इस चमन को छूता

तुझ सा पावन नहीं है दूजा

तू मधुबन की राजकुमारी

उड़ती परी सी पंखो वाली

नैन तेरे मृग जैसे चंचल,

देख तुझे आकाश मे हलचल

बादल भी बिजली भी तू है

वायु के कण कण मे तू है

तुझमे सारा सागर ठहरा

सागर की मोती सा सुनहरा

वन मे कोई मोर नाचती

गीतों का सरगम साधती।

ऐसे तेरे चाल हैं अनुपम,

मन को बांधे रखती प्रियतम!


-अमित टंडन (amit kumar)



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